कोटा कैसे बना ‘सुसाइड सिटी’

कोटा वैसे तो शैक्षिण नगरी के नाम से प्रसिद्ध है पर पिछले कुछ सालों से उसे एक और ‘अनचाहे ‘ नाम से जाना जाने लगा है और वो है ‘सुसाइड सिटी’।

कारण साफ़ है वहां होने वाली ‘आपके’ बच्चों की आत्म हत्याएं। बीते कुछ सालों से लगभग 10 से 20 सुसाइड हर साल हो रहे हैं।
कोटा भेजने से पहले आप कभी सोच भी नहीं सकते की इनमें से कोई आपकाअपना बच्चा भी हो सकता है।

क्योंकि अभी तक की स्कूल लाइफ में कभी आपने आपके बच्चे के चेहरे पर ‘ वो ‘ दवाब महसूस ही नहीं किया होता है, जो कोटा जाने के बाद आपका बच्चा महसूस करने वाला है। कहने को वो अपने ही जैसों की लाखों की “भीड़” से घिरा होता है पर प्रतिस्पर्धा की वजह से किसके भीतर क्या चल रहा है कोई नहीं समझ सकता। ऐसे में वो ‘उन’ कठिन हालातों में ख़ुद को निपट अकेला पाता है और इस ‘अनहोनी’ की तरफ क़दम बढ़ा लेता है।

पिछले दिनों कोटा के दैनिक भास्कर का एक अंक पढ़ा तो पता चला की इधर जैसे ही अलग अलग कॉम्पेटेटिव एग्जाम का दौर शुरू होने को हैं उधर दूसरी ओर suicides की खबरें भी आनी शुरू हो चुकी हैं। पिछले 13 दिनों में 3 बच्चे जिंदगी से हार मान , मौत को गले लगा चुके हैं।

कोटा में जनवरी ,फरवरी में ये आँकड़ा बहुत तेज़ी से बढ़ता है। अगर आप का बच्चा इस वक्त कोटा में हैं तो उससे बात कीजिये।

अपेक्षाओं का बोझ अगर डाल रखा है तो उसको भी खत्म कीजिये। बात करेंगे तो स्थितियां सुधरेंगी।

बाकी फिर….

Note-exact data may increase or decrease.

अपने आखिरी साल में जब मैं कोटा में था तब हर तीसरे दिन suicide की खबर पढ़कर मन उदास हो जाता था।

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